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सम्पादकीय - डा. जे आर यादव

सम्पादकीय

प्रिय बन्धुओ ! वार्षिक पत्रिका 'प्रगति” आपके हाथों में है। उत्तर भारतीय विकास संस्थान के स्थापना के १2 वर्षो की संघर्षपूर्ण यात्रा के दौरान 'प्रगति' के प्रकाशन सम्पादन में अनेकानेक उतार चढ़ाव आये | कभी पुस्तिका रूप में तो कभी फोल्डर फार्म में कभी वो भी नहीं, कभी त्रैमासिक तो कभी फिर से वार्षिक स्वरूप में। आप सभी ने एक अति प्रचलित कहावत तो अवश्य की सुनी है “न सूत न कपास, जुलाहे से लट्ठम लट्ठ” कुछ ऐसी ही परिस्थितियाँ हमारी वार्षिक पत्रिका 'प्रगति' के सम्मुख भी पैदा हुई । ऐसी बात नहीं कि संस्थान के सदस्यों, रचनाकारों, सम्पादन प्रकाशन मंडल में किसी प्रकार की उदासीनता का भाव पैदा होने के कारण पत्रिका प्रकाशन सभ्भव नहीं हो पाया, बल्कि इसका मूल कारण रहा "अर्थाभाव”|अर्थभाव दूर करने का समुचित जुगाड़ नहीं हो पाने के कारण ही पत्रिका सम्पादन प्रकाशन में व्यवधान उपस्थित हुआ | जबकि रचनाकारों एवं समस्त सदस्यों का बराबर आग्रह रहा कि चाहे जो भी हो पत्रिका अवश्य प्रकाशित होनी ही चाहिए परन्तु फिर बात वहीं आकर ठहर जाती है कि “ न सूत न कपास, जुलाहे से लट्‌ठम लद्ठ”

उत्तर भारतीय विकास संस्थान, उदयपुर का सन्‌ 2010 में विधिवत पंजीकरण (रजि. न. 73,/ उदय / 2040-44) हो जाने के कारण माननीय सदस्यों एवं कार्यकारिणी के अति उत्साह समर्थन आदि के देखते हुए पत्रिका के नियमित प्रकाशन का मानस बनाया गया। विभिन्‍न लब्ध प्रतिष्ठित व्यक्तियों के शुभकामना संदेश प्राप्त होने, रचनाकारों की रचनाएं मिलने, आर्थिक सहयोग आश्वासनों के कारण विधिवत प्रकाशन सभ्भव हो सका |

वार्षिक पत्रिका “प्रगति” मात्र रचनाओं एवं सूचनाओं का पुलिन्दा ही नहीं अपितु सामाजिक समरसता तथा धार्मिक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता का दस्तावेज एवं पथ भ्रष्ट लोगों के लिए (चोरी, तस्करी, अपहरण, लूट, हत्या, आतंक आदि में लिप्त) समुचित मार्ग दर्शिका भी है। रचनाओं के शिल्प, कथानक, भावाभिव्यक्ति एवं प्रेषणीयता, भावपक्ष, कलापक्ष आदि साहित्य की कसौटी पर साहित्य मर्मज्ञों के लिए भले ही खरे न उतरते हो परन्तु इस दिशा में उनके प्रयास अवश्य ही स्तुत्य है | गोस्वामी जी के शब्दों में "जो बालक कहि तोतरिबाता, सुनहिं मुदित मन पितु अरूमाता” अतः सुधी पाठक इन रचनाओं एवं शिशु प्रयास को माता पिता की भाँति बच्चों की तोतली अभिव्यक्ति मानते हुए ग्रहण करेंगे, ऐसी मेरी मान्यता है और विनती भी |

श्रीमती उमा शर्मा की हास्य कविता “चाय चर्चा ” पाठको हँसाती गुदगुदाती है, वही “शान्ति और शक्ति” नामक कविता हमारी सकारात्मक जीवन शैली और शान्ति भक्ति शक्ति ही जीवन के सच्चे आनन्द की ओर ले जा सकती है | सर्वेश कुशवाहा की रचना “माँ क्या है” में माँ को अनन्त दास्तानों से युक्त "कीमती तोहफा' बताती है | मौलिक एवं प्रतिष्ठित कवयित्री आसमा बेगम की गजल पूरे समाज को नई दिशा (हमेशा किया अपने घर को ही रोशन, गरीबो का चूल्हा जला कर तो देख) प्रदान करती है। अजित प्रताप सिंह की कविता वीर भूमि मेवाड़ की वीरता, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा एवं समपर्ण की शिक्षा पन्‍नाधाय माँ के चरित्र चित्रण से दी है स्पृहा यादव की रचना 'शक्ति और अभिव्यक्त' हमारे सम्मुख '

सर्वव्याप्त, परमशक्ति, विराट स्वरूपा अम्बा, जगद्म्बा, काली, कपाली, पार्वती, सरस्वती आदि' का वर्णन करके आध्यात्मिक दिशा प्रदान करती है। संस्थान के वरिष्ठ सक्रिय कार्यकर्ता एवं संस्थान के नींव की ईट श्री शिव जी कुमार पटेल की रचना ' जीवन के मंत्र, महामंत्र के संग हरे राम हरे कृष्ण को जीवन का महामंत्र बताया है, उनके जीवनोपयोगी टिप्स अनुकरणीय हैं | ब्रह्ममदेव यादव की रचना * पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण आज की ज्वलंत समस्या “ग्लोबल वार्मिंग” “ ब्लेक होल' जैसे आपदा सूचक विपदाओं से निजात पाने की ओर स्पष्ट प्रकार के बहुआयामी धरातल की सैर कराती है।

श्री श्याम बिहारी वशिष्ठ जी का निबंध " विद्यार्थियों के गुण' चरित्र एवं कर्तव्यों तथा उतरदायित्वों पर सम्यक प्रकाश करता है। समीर सिंह यादव की रचना 'हम तटस्थ क्‍यों" में अपराध करने वाले से ज्यादा जिम्मेदार अपराध होते देखते रहने वाला है दर्शाया गया है |

वार्षिक पत्रिका प्रगति में विभिन्‍न प्रकार की सूचनाओं के (विभिन्‍न विभाग जैसे पुलिस, रेलवे, टेलीकॉम, पोस्ट आफिस, विश्वविद्यालयों, मेडिकल संस्थानों, होटलो, पर्यटन स्थलों आदि) टेलीफोन अथवा मोबाइल नम्बर दिये गये है, जिनसे हम सभी को सम्पर्क साधने में अति सुविधा होगी। इसके अतिरिक्त संस्थान के कार्यकारिणी सक्रिय एवं सामान्य सदस्यों को यथासम्भव पारिवारिक विवरण भी पत्रिका में दिया गया है, जिससे हम सभी एक दूसरे से घरेलू जुडाव रख सकें।

सम्पादक मण्डल श्री केदार नाथ यादव, श्री श्याम बिहारी वशिष्ठ, श्रीमती उमा शर्मा, श्रीमती आसमा बेगम तथा श्रीमती सर्वेश कुशवाहा को मै हृदय से अभार व्यक्त करता हूँ जिनके समय समय पर समूचित मार्गदर्शन के कारण पत्रिका का सम्पादन सम्भव हो सका |

थोड़ी बहुत खूबियों के साथ- साथ बहुत कुछ खामियों का होना अवश्यमभावी है। अतः कमियों की ओर इशारा तथा उन्हे सुधारने की आवश्यक सलाह, सुझाव सादर आमंत्रित है। हम भरोसा दिलाते है कि विज्ञ पाठकों की सलाह का हार्दिक स्वागत किया जावेगा तथा भविष्य में उन गलतियों को सुधार कर सुधी पाठकों के हाथो में पत्रिका पहुचेगी | आप सभी की ओर संस्थान की निरन्तर उन्नति प्रगति के लिए 'प्रगति' की ओर नव वर्ष 2044 के सुखमय, समृद्विशाली और गौरवपूर्ण उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाओं सहित !

डा. जे आर यादव
प्रधान सम्पादक
उत्तर भारतीय विकास संस्थान, उदयपुर

08 मार्च 2021

उत्तर भारतीय विकास संस्थान

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सभी के लिए एक हार्दिक नमस्कार, यदि आप इस पृष्ठ पर पहुँचे हैं तो एक उच्च संभावना है कि आप वास्तव में हमारे और हमारे दर्शन के बारे में गहराई से जानना चाहते हैं। शुरुआत में, इस पृष्ठ को पढ़ने के लिए धन्यवाद। लेखक उत्तर भारतीय विकास संस्थान है। अब तक आप जानते हैं कि हम उत्तर भारतीय विकास संस्थान पिछले 21 वर्षों से जनता के विकास के क्षेत्र में काम करने वाले उच्च गुणवत्ता वाले पेशेवरों की एक टीम हैं। हमारी ताकत हमारी टीम है और हमारी पूरी कोशिश है कि हम हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करें।

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