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संस्थान का व्यापक प्रचार-प्रसार हो इसलिए टीम भावना से कार्य करना होगा | सीनियर एवं उत्तर भारतीयों विद्वानों,
समाज सेविकों, मनीषियों, विदूषियों, कवि-साहित्यकारों तथा प्रबुद्ध-प्रतिष्ठित व्यक्तियों को संस्थान से जोड़े, जो भी
सदस्य जिस 'एरिया या जोन' में रहता है, वहाँ से ऐसे उत्तर भारतीय जो संस्थान से नहीं जुड़े हो, उन्हे
व्यक्तिगत / सामूहिक रूप से संपर्क करके उन्हें जोड़े, तभी संस्थान का सम्यक् विकास संभव हो सकता है |
आर्थिक सुदृढ़ता किसी भी संस्थान के विकास के लिए परमावश्यक है | संस्थान में सदस्य संख्या जितनी भी अधिक
होगी आर्थिक दृष्टि से हम उतने ही सुदृढ़ होंगे। “प्रगति-पत्रिका” संस्थान की संदेश-वाहिका बने, संस्थान की
रीतियों-नीतियों से आम लोगों को परिचित कराये, अभिव्यक्ति का माध्यम बने, अनेकानेक सूचनाओं की संदर्शिका का
कार्य करें, ऐसी संस्थान की कामना है।
संस्थान की तरफ से अधिक से अधिक सदस्यों से अपेक्षा की जाती है कि वह अपना तन, मन, धन से पूर्ण सहयोग
देवें ताकि हम संस्थान को निरन्तर प्रगति के उच्च शिखर पर पहुंचा सकें। यह तभी संभव होगा जब हम सब एक जुट
होकर ऊँच, नीच, जाति-पाति से ऊपर उठकर तथा अनुकूल व प्रतिकूल परिस्थितियों से परे होकर एवं भाई-चारे तथा
प्रेम की भावना से संस्थान के हित में कार्य करें।
अन्त में मैं सभी पधारे सम्मानीय सदस्यों, मातृशक्ति एवं बच्चों को संगठन की तरफ से हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित
करता हूँ कि उन्होंने अपना अमूल्य समय निकालकर संस्थान को समर्पित किया | इसके अतिरिक्त जो संस्थान के सदस्य
किन्हीं कारणवश उपस्थित नहीं हो सके, उनके एवं सभी उत्तर भारतीयों के उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ, इसके
साथ ही मैं अपने शब्दों को यही विराम देता हूँ।
जय भारत ! जय संस्थान
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